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अध्यात्म और संस्कृति की अद्भुत विरासत गोडवाड PDF Print E-mail

 

अध्यात्म और संस्कृति की अद्भुत  विरासत गोडवाड

 

गोडवाड़ परिचय

‘‘दानी, मानी, गौरव संता, वीर भौम री प्रतिपाला।

नमन करां म्है दिनराता, गोडवाड़ भुजदंड़ री पाळा।।

गोडवाड़ रा आला-झाला, चावा नाम प्रकटाता देशा।

थड़ा, झुंझार-छत्रियां, महला, गाता गीत पाळा जाता।।

इण धरती ने नमन, इनपे प्राण न्यौछावर।

म्हारी इण मायड़ माथै, घणा म्हानै अभिमान।।’’

  • स्थिति- गोडवाड़ प्रदेश मेवाड़-मारवाड़ का संधि स्थल! गोडवाड़ का प्रदेश आदिकाल से वेदों में वर्णित अरावली (आड्डावल) पर्वत श्रृंखला के पश्चिमी ढाल से 100 किमी. चौड़े व 150 किमी. लम्बे भू-भाग में स्थित है।
  • महत्ता - इस धरती की अपनी पहचान, राजस्थान के हृदय पटल से आंकी जाती है। मेरू व मरूभूमि के बीच उपजाऊ भूमि-पर्वतीय प्रदेश, बहते नदी-नाले, कुंए, बावडियां, सर, गढ़, कोट, परकोटे, छत्रियां, मंदिर, जौहरभूमि, लोकदेवता, वीर, देवता स्थल, गांव व ढाणी-ढाणी में अपनी संस्कृति की छाप से स्थापत्य कलाकृति से संजोये हुए है। यहां की शिल्प, वास्तुकला, कारीगरी, चित्रशैली, लिपी, वेशभूषा की पहचान है तो यहां के लोग सीधे-साधे, गौरव-गरिमामय, आतिथ्य सत्कार के धनी मधुरभाषी, व्यवहार कुशल राजस्थान में एवं रीढ़ की तरह आधार रखने वाले है। यहां की ऐतिहासिक महत्ता अपना विशिष्ट स्थान रखते है। मेवाड़ व मारवाड़ के बीच ईसा पूर्व से 10 शताब्दी तक यहां के प्राकृतिक मार्ग जिसे नाल कहते है पूरे भारतवर्ष से जुड़े हुए है। यहां की ऐतिहासिक, पुरातत्व, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक, दर्शनीय-निर्माण कला-शिल्प कारीगरी का अपना शैलीयुक्त महत्वपूर्ण अंकन है। दुःखद बात है कि इस गोडवाड़ भू-भाग का इतना महत्वपूर्ण स्थान एवं यहां के शिलालेख, ताम्रपत्र एवं निर्माण का कार्य होते हुए भी इसका विस्तार से समग्र रूप से कोई अपना स्वतंत्र इतिहास नहीं है।

  • गोडवाड़ क्षैत्रः- इस क्षैत्र को गोडान, गोडवार, गोडवाड़, गौद्वार, आडावल्ल क्षैत्र और वेद में वर्णित ‘सप्तशत भूमि’ के नाम से जाना जाता है। अरावली पर्वत श्रेणी के पश्चिमी ढाल से 100 किमी. लगभग दूर तक पश्चिमी दिशा तक व दक्षिणी में वर्तमान आबूरोड़ (खराड़ी प्राचीन वाड़ा गांव नाम) तरतोली, भारजा से उत्तर में वर्तमान जोजावर तक लगभग 150 किमी से अधिक लम्बाई का भूभाग एवं इस अरावली के पश्चिमी ढाल में स्थित कस्बे, गांव, गढ़, किले, प्राचीर, छतरियां, महल, चबूतरें, खंडहर इस श्रेणी से निकलने वाले जल प्रवाह, वनस्पति, वनौषधियाँ, कृषि क्षेत्र, बीहड जंगल, ओरण, प्राकृतिक रम्य स्थल, मार्ग, खोह, नाल (प्राकृतिक मार्ग जो व्यापार सैना अभियान) में काम आते थे।
  • गोडवाड़ की प्राकृतिक, घाटियों के बीच 20 कि.मी. लम्बे हजारों वर्षो से व्यापारिक मार्ग उत्तरी भारत मध्य भारत से दक्षिण भारत को जोडने का एकमात्र घाट मार्ग है जिसे हाथी गुड़ा की नाल कहते है। इस अरावली के पश्चिमी ढाल में कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक पावन प्रसिद्ध नगर, कस्बे, ग्राम शासन, शासक, व्यापार, कला केन्द्र खनन, शिल्प ज्योतिष, धार्मिक संस्थान केन्द्र में अग्रणी जिसे सप्तशत गोडवाड़ से जाना गया। आक्रान्ता के समय दढ़ प्रहरी मेदपाट के मुख्य रक्षक के रूप में दृढ़ प्रतिज्ञ यह धरती सदैव से दो पाटों के बीच वीर रस का प्रवाह से प्लावित होती रहीं। पढते, चर्चा करते मुझे लगता कि इस प्रदेश के बारे में लोग चर्चा क्यों नहीं करते। इस भूमि के वृत को जानने को मन उद्यत हुआ। जब देवी मां चामुण्ड़ा के देवल में चार-पांच विस्तार से लिखे शिलालेख 10-11वीं शताब्दी के मिले तो पूरे गांव के मंदिर, गढ़, किला चबुतरा, तालाब, बावडियां, पहाड़ में खोज की। बहुत सा भण्डार ऐतिहासिक का मिला। 1970 से अनवरत कार्य चलता रहा। इसी गोडवाड़ क्षेत्र के मुख्य ढालोप, नाडोल, नाडूल्य, नाना, बीजापुर, बाली, सादड़ी, घाणेराव के पृष्ठ  का उखेरने पर इनकी गौरव गरिमा, शान, आन, बान, प्रतिष्ठा, दृढता, निवासियों के रक्त प्रवाह के अदम्य उत्साह, शौर्य वीरता के पाठों को जाना तो गोडवाड़ के प्रति नतमस्तक होना पड़ा। 300 से अधिक शिलालेख का पट्टे 11वीं शताब्दी से ताम्बापत्र, परवाने, निर्मित कीर्ति क्षेत्र निर्माण की वास्तुकला को देखकर मालूम हुआ कि प्राचीन गोडवाड़ कितना समृद्धशाली, खुशहाल, उर्वर, धरती में पगा है, नशा आने लग गया, मेद मरू के बीच इस धरती का कोई अपना स्वतंत्र इतिहास नहीं। इस गोडवाड़ पर किसी भी इतिहासकार ने अपने पेनी दृष्टि से इसका मूल्यांकन कर स्वतंत्र लेखनी से इतिहास को पिराया हो, साक्ष्य नहीं मिलता।
  • यहां की कला, संस्कृति, इतिहास, शिल्प, चित्रकला, ज्योतिश, दर्शन, व्यापार, मार्ग, दण्डनायकों की व्यवस्था, गण व्यवस्था, राजव्यवस्था कई जातियों की शाखाओं का प्रादुर्भाव, पाट स्थान अपना विशिष्ट स्थान रखते है। खोज की आवश्यकता है अभी भी छिपे भग्नावशेष, मंदिर, दाण, विदेशी से, पडौसी राज्यों से अपने महत्वपूर्ण संधि, संबंध उजागर करने में यह अग्रिम है।
  • खनिज क्षेत्र, धार्मिक, सांस्कृतिक, पुरात्व ऐतिहासिक, सामाजिक दृष्टि से व सामरिक दृष्टि के क्षेत्र का यह क्षेत्र मेदपाट व मरूपाट (मेवाड़-मारवाड़) का संधिस्थल है।
  • गोडवाड़ का यह पृष्ठ हम प्रकाशित करेंगे तब ऐसा आभास होगा कि यह तीर्थो का क्षेत्र सांस्कृतिक मेले, लोक देवता, लोक गीत, लोकनृत्य, लोक कला, लोकोक्तियां, यहां का प्राकृतिक वातायन जो साहाद्रा मय (जल मय) भींगा, ठंडा, वातानुकूल, हरे भरे खेतों , घाटियों , खलिहानों के बीच रंग, उमंग, स्वर लहरी से अटा पटा प्रभात कालीन सांध्य की सुनहरी छटा के बीच जन जीवन का स्पन्द करता। नव चेतना, जाग्रति का स्वर बिखेरता, जन कल्याणकारी गाथाओं का सन्देश, नव निर्माण में चेतना भर रहा है। इस गोडवाड़ की रूपरेखा एक अद्भुत सत्य के तेज से आवरित आपकों परिचय के रूप में परोसने का गर्वित गर्व है। एक हजार वर्ष पूराना 360 गांवों में बसा इस गोडवाड़ की छबि को प्राचीन से अद्यतन की गाथा गान है। इस शोध संस्थान पर हमें गर्व है इस कार्य क्षेत्र के विद्वान, विचारक, चिन्तन, चर्चित, सत्य की कसौटी पर पूर्ण विश्वास के बाद ही लेखन कार्य का गौरान्वित लेखन कार्य कर संस्थान की प्रतिष्ठा को अपना मान सम्मान समझते है। यह भू भाग में 360 ग्राम-कस्बे 150 कि.मी. लम्बा व 50 कि.मी. चौड़ाई तक इतिहास उजागर करता है।
  • संस्थान के अनुभवी संरक्षक, कार्यकारिणी, सदस्य एवं विद्वान साथियों के साक्ष्य, सबूत, हेरिटेज कल्चर, राज्य के पुराने दस्तावेज, शिलालेख, पट्टे, परवाने, रकबा से इसको इतिहास-सांस्कृतिक दृष्टि से 20 भागों में चेप्टर के नाम से बांटा गया है। प्रत्येक चेप्टर मे लगभग 20 ग्राम है। साक्ष्य सामग्री, इतिहास मिलान, प्राचीन आयामों को पुनः स्थापन करना, साक्ष्य के साथ इतिहास प्रकट करना है। हम सभी का ध्येय एवं शोध  संस्थान का एक ही लक्ष्य है कि इस क्षेत्र का सम्पूर्ण जो गौरव-महिमामय छिपा वैभव है। साहित्य, संग्रहालय अनेकानेक वे उद्देश्य जो हमारे संविधान है को हम पूरा करे। गर्व से कह सके कि यह महिमामयी भूमि अपने आपमें एक अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसका श्रेय सभी को है जो इसमें योगदान कर रहे ।

 

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News & Events

  • गोडवाड़ क्षैत्र के 246 ग्रामों का ऐतिहासिक सर्वक्षण, सन् 1800 तक के षिलालेख, पांडुलिपियाँ खोज, ऐतिहासिक स्मारक, मंदिर, गढ़, परकोटे, बावडियाँ, तालाब, मुर्तियाँ, ताम्रपत्र, रणक्षैत्र, लिपियाँ, अभिलेख का संकलन एवं प्रकाशन

    Tuesday, 17 February 2015 17:32
  • लेखन साहित्य-कला, धरोहर, सांस्कृतिक स्थल, षिल्प, वास्तु, म्युरल, प्रकाषन, हिन्दु-जैन व शोध लेखन का ऐतिहासिक सर्वेक्षण

    Tuesday, 17 February 2015 17:34
  • गोडवाड़ का प्रसिद्ध मंदिर निम्बो का नाथ इतिहास परख षोध वि.सं. 1637 से (महाराणा उदयसिंह) के वंषजों का इतिहास प्रकाषन हेतु मुद्रणालय में।

    Tuesday, 17 February 2015 17:35
  • गोडवाड़ ऐतिहासिक मंच द्वारा अनेक राजस्थानी भाशा विकास हेतु ऐति. लेखन, साहित्यकारों का सम्मान, जीवनी, उनके प्रेरक प्रसंग लिपिबद्ध प्रकाषन की ओर।

    Tuesday, 17 February 2015 17:35
  • आदिवासी व जन-जाति पर, गिरासियां, भील, मीणा, गाड़ोलिया, व रेबारी समाज पर प्रस्तावित सर्वे एवं लेखन कार्य

    Tuesday, 17 February 2015 17:37
  • • ‘गोडवाड़ का जानो’ सामान्य ज्ञान परीक्षा सत्र 2014 कक्षा तृतीय से महाविद्यालय स्तर तक का आयोजन।

    Sunday, 22 February 2015 13:32
  • • राजस्थान साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्वारा राजस्थानी रचना पाठ संगोष्ठी एवं जनकवियों का सादड़ी में आयोजन।

    Sunday, 22 February 2015 13:34
  • • महाराणा प्रताप का जन्म स्थान एवं गोडवाड़ में उनकी देन महाराणा प्रताप के वंशज गोडवाड़ क्षेत्र में विशेष संस्करण का प्रकाशन।

    Sunday, 22 February 2015 13:35
  • गोडवाड़ ऐतिहासिक मंच द्वारा अनेक राजस्थानी भाषा विकास हेतु ऐति. लेखन, साहित्यकारों का सम्मान, जीवनी, उनके प्रेरक प्रसंग लिपिबद्ध प्रकाशन की ओर।

    Sunday, 22 February 2015 13:35
  • आदिवासी व जन-जाति पर, गिरासियां, भील, मीणा, गाड़ोलिया, व रेबारी समाज पर प्रस्तावित सर्वे एवं लेखन कार्य,

    Sunday, 22 February 2015 13:36
  • राणा प्रताप की जन्म-स्थली-पाली-कुडंली एक खोज

    Sunday, 22 February 2015 13:36
  • जागृति जोत, साहित्य अकादमी, पत्रिका, दैनिक, पाक्षिक, एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं में सर्वे एवं लेखन कार्य,

    Sunday, 22 February 2015 13:37
  • मुम्बई (महाराष्ट्र) दैनिक, प्रातःकाल में गोडवाड़, गाथा, मई 2008 से लगातार प्रकाशन

    Sunday, 22 February 2015 13:37

गोडवाड़ विरासत (सांस्कृतिक, ऐतिहासिक हिन्दी मासिक पत्रिका)

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ऐतिहासिक हिन्दी मासिक पत्रिका

1970 ई. से गोडवाड़ विरासत ने अपनी मातृभूमि गोडवाड़ के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक का वारिस गोडवाड़ के लिए तत्परता निभाई। अब इसे नियमित रूप से मासिक प्रकाशन करते हुए देश के कोने-कोने में बस रहे गोडवाड़ मारवाड़ के महानुभावों तक इस पत्रिका को पहुंचाया जा रहा है।

गोडवाड़ - धार्मिक पर्यटन का पथ

गोडवाड़ प्रदेश में इतने अधिक तीर्थस्थल है ऐसा लगता है जैसे सभी देवताओं का आर्शीवाद इस भू-भाग को ही प्राप्त है। धन्य हैं यहां के वाशिंदे जहाँ प्रकृति ने अपना सम्पूर्ण प्रेम न्यौछावर कर दिया और देवता भी इस पवित्र धरती का गुणगान करते है और इस धरती पर जन्म लेने के लिए लालायित हैं।

Photos of Godwad Virasat

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सम्पर्क करें

गोडवाड़ विरासत

हनुमान कालोनी, राणकपुर रोड़, सादड़ी 
तहसील-देसूरी, जिला-पाली (राज.) 306702
फोन - 02934-285135,
मो.- 9928999157, 8104747425, 9636580669

Email- info@godwadvirasat.org
Web: www.godwadvirasat.org

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